नरेन्द्र मोहन के लिए डायरी (सर्जन) एक तरह की सुलगती खामोशी है जो किन्हीं खास क्षणों में सिर चढ़ कर बोलती है। एक पीड़ा, एक पैशन, एक थ्रिल जिसे आप रोक नहीं पाते, जिसके बिना न जी पाते हैं, न मर पाते हैं। यह वह अन्दरूनी स्पेस है जहाँ आप एक साथ जीते-मरते हैं। अलग-अलग माध्यमों और उनकी विशिष्टताओं के बावजूद सर्जनात्मकता का स्पंदन और एक सपने को बचाने की कोशिश सभी कलाओं में साँझी है। साहित्य की किसी भी विधा में लिखते हुए नरेन्द्र मोहन इस सपने और स्पंदन से, अभिव्यक्ति की छटपटाहट से गुज़रते हैं, उस वक़्त कहीं ज़्यादा जब वह दूसरी कलाओं चित्र, छवि-चित्र, नृत्य और संगीत के अनुभवों को अभिव्यक्त करते हैं। नरेन्द्र मोहन की डायरी— ‘साहस और डर के बीच’ ऐसे ही अनुभव-क्षणों का कोलाज़ है सच की टेक पर बिना डरे कला-संरचनाओं, साहित्य, समाज और राजनीति के बीहड़ में प्रवेश करती, तथ्यों और घटनाओं के साक्ष्य के साथ समाज और राज्य पर एक साफ़, निष्कपट और निडर आवाज़ की प्रस्तुति। वैचारिक-भावनात्मक बेचैनियाँ, ज्ञान, संवेदना, साहित्य और कला माध्यमों की धमकें, हलचलें और सभा-संगोष्ठियाँ यहाँ महज़ दर्ज़ ही नहीं हुई हैं, दस्तावेज़ बन गई हैं। काल के अंतरालों में बिंधे आत्म-कथन और आत्म-स्वीकृतियाँ के दायरे यहाँ इतनी तेजी से व्यापकता धारण करते हैं कि आश्चर्य होता है। जहाँ तक व्यक्ति के लम्बे आत्म-संघर्ष के बहुपक्षीय निरुपण का प्रश्न है, वह इस डायरी का हिस्सा है सृजन का नेपथ्य! और हाँ, नरेन्द्र मोहन और निंदर का द्वंद्व डायरी में बड़ा दिलचस्प है। अपना होते हुए भी ‘दूसरा’ वह बीच-बीच में मुँह उठाए चला आया है कई स्वरों-सरोकारों से भरपूर डायरी का केन्द्रीय मेटॅाफर!
साहस और डर के बीच
By: Narendra Mohan (Author)
₹450.00
- Language : Hindi
- Print length : 200 pages
- ISBN-10 : 9381619883
- ISBN-13 : 978-9381619889
- Item Weight : 400 g





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