घिसी चप्पल की कील रंगकर्मी और कवि भारतरत्न भार्गव का चालीस वर्ष के लम्बे अंतराल बाद प्रकाशित दूसरा कविता संग्रह है। इस दौरान भरत मुनि के नाट्यशास्त्रा से लेकर आधुनिक रंग-अवधारणआें के चिंतन-मनन ने उन्हें कोई अवकाश नहीं दिया। संभवतः दूसरा प्रमुख कारण अपनी पूर्व रची कविताओं के प्रति मोह भंग के साथ-साथ संप्रेक्षण के लिए नए मुहावरे, भाषा, शिल्प और विषय की तलाश भी रहा होगा। संगीत, नाट्यशास्त्रा और आधुनिक रंगमंच की संलग्नता ने उन्हें शब्द की अनोखी सत्ता से परिचित कराया। कविता में भाषा का इतना अधिक महत्त्व नहीं, जितना शब्द का है। कविता के शब्द का जितना अधिक अर्थ विस्तार होगा, कविता उतनी ही प्रभावशाली होगी। उनका कहना है— ‘मेरे लिए कविता का शिल्प विषय के नावीन्य से उद्भूत अनुभव, उसकी आंतरिकता और सम्प्रेक्षण के लिए यथोचित मुहावरे की तलाश से सम्बंधित है। कोई एक दृश्य, स्थिति अथवा अनुभव यदि किसी विचार को जन्म देते हैं, तो उस विचार से संवाद करना मुझे सर्जनात्मक संतोष देता है, यदि वह संवाद सार्थक है और मेरे अनुभव-संसार में कुछ नया जोड़ता है या जोड़ सकता है, तो वह मुझे कविता लिखने को विवश करता है। इस संग्रह की अधिकांश कविताओं में संभवतः यह तत्व अभिव्यंजित होगा।’ शब्द की सत्ता कविता के छंद और लय में निहित होती है, पर प्रायः ऐसी कविताओं में रागात्मकता को ही स्थान मिलता रहा है। इसके विपरीत भारतरत्न भार्गव की कविताओं में सामाजिक विसंगतियों, विषमताओं, वंचित और उपेक्षित वर्ग के चित्रा ही प्रखरता से उभरते हैं। ‘कचरा बीनते रामधुन’, ‘हवा’ और ‘शोकगीत’ को इस संदर्भ में देखा जा सकता है।

घिसी चप्पल की कील
By: Bharat Ratna Bhargav (Author)
₹250.00
- Language : Hindi
- Print length : 128 pages
- ISBN-10 : 9381619875
- ISBN-13 : 978-9381619872
- Item Weight : 250 g
- Country of Origin : India



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