लगभग पचास साल बाद ‘वायदा माफ गवाह’ का पुनः पाठ करने पर मन में संकोच बना है। क्या उसे उसी रूप से छपवाना उचित होगा? मैंने उसे आज लिखा होता तो उसका वह रूप कतई न होता। भाषा का उन्मुक्त आवेग — शब्दों के पास ठहरने की जैसे फुर्सत ही न हो, शिल्प की अनगढ़ता और तराश और भी बहुत कुछ। फिर भी, मैं इसे प्रकाशन हेतु सौंप रहा हूँ तो उसका एक कारण तो यह है कि मुझे यह समय विशेष की उन अनुभूतियों का स्मरण कराता है जो मेरे जीवन का अहम् हिस्सा रही हैं। इसके अलावा, इसमें झूठ व चातुर्य की वह मिलावट न्यूनतम है जो धीरे-धीरे परिपक्व होने के साथ-साथ हमारे लेखन व जीवन में वृद्धि करते चलते हैं। प्रसंगवश, 1975 के सितम्बर का दिन (‘वायदा माफ गवाह’ को प्रकाशित हुए एक-दो माह ही बीता होगा) जब मुझ जैसे अनजान और साहित्य की दुनिया में नवागंतुक लेखक को प्रख्यात वरिष्ठ लेखक श्री उपेन्द्रनाथ अश्क ने ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ के गलियारे में कोली में भर पीठ थपथपाते हैरान कर दिया था— ‘नाश्ते की मेज़ पर ‘वायदा माफ गवाह’ पढ़ना शुरू किया तो सब कुछ भूल कर एक सीटिंग में पूरा पढ़ गया।’ युवा लेखक के रोमांच और आह्लाद की आप कल्पना कर सकते हैं। वायदा माफ गवाह के प्रथम प्रकाशन को लगभग 50 वर्ष हो रहे हैं। प्रिंट मीडिया में जो अंधेरा उस समय दिखाई देता था, वह आज और भी सघन हो चला है। अनेक साहित्यिक और चिंतनपरक पत्रिकाएँ काल-कलवित हो चुकी हैं। जनोन्मुखी सामाजिक सरोकारों और प्रतिपक्ष की भूमिका का दायित्व निर्वहन करने वाली पत्राकारिता सिर्फ़ सत्ताधारियों की चापलूसी और जनविरोधी नीतियों का प्रचारतंत्र मात्र होकर रह गई है। ऐसी स्थिति में अपनी यह लघु-रचना आज भी प्रासंगिक प्रतीत होती है।

वायदा माफ गवाह
By: Ashok Agrawal (Author)
₹150.00
- ASIN : B0DRT96KPX
- प्रकाशक : Sambhavna Prakashan
- ऐक्सेसिबिलिटी : और जानें
- प्रकाशन की तारीख : 28 दिसंबर 2024
- भाषा : हिंदी
- फ़ाइल का साइज़ : 49.2 MB




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