अरुण कुकसाल के अद्भुत यात्रा संस्मरणों का मैं पुराना पाठक और घोर प्रशंसक रहा हूँ। कुमाऊं-गढ़वाल के दूरस्थ ग्रामांचलों के इतने आत्मीय संस्मरणात्मक रेखाचित्र मैंने अन्यत्र नहीं पढ़े। वर्तमान में तो इतने गहरे सरोकारों के साथ लिखने वाले लेखक सचमुच बहुत कम हैं। —लक्ष्मण सिंह बिष्ट ‘बटरोही’
गहराई और लगाव अरुण कुकसाल के लेखन की आंतरिक आकृति है। उनकी कथन शैली अपने स्वाभाविक उरूज पर पेश आती है। जिन्दगी में गहरे पैठे बिना भाषा में सच्चाई का सौन्दर्य उमड़ता नहीं और वाचक को पाठलीन नहीं कर पाता है। अरुणजी की लेखनी पहाड़ों में ऐसे दौड़ लगाती है और पाठक का ऐसा साथ करती है, जैसे दोनों हमजोली हैं। लगता है, लेखक नहीं पाठक स्वयं लिखने निकल पड़ा है। जिन्दगी स्वयं भी तो एक चोटी है, जिस तक चढ़ना पड़ता है। और, अरुण कुकसाल एक विकट आरोही हैं। —त्रिनेत्र जोशी





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