‘स्वायत्तता’ और ‘बहुवचनता’ अशोक वाजपेयी के लेखन के बीज-शब्द हैं। आजीवन अशोक वाजपेयी ने कविताओं के लिए जगह बनायी है चाहे वह पत्रिका के रूप में हो या संस्था के रूप में। अशोक वाजपेयी के लिए कविता उस इकाई की तरह है जिसके कथ्य और शिल्प को अलग-अलग करके नहीं समझा जा सकता। अशोक वाजपेयी ने अब तक अर्जित मनीषा की परम्परा में अपने को देखते हुए हिन्दी आलोचना की समाज निर्भरता और उसके विचारधारात्मक आग्रह के समक्ष स्वायत्त साहित्य का एक मज़बूत और वैचारिक उत्तेजना से भरा पाठ प्रस्तुत किया है। आमफ़हम शब्दावली के उपयोग से आलोचना की जड़ता को भी तोड़ा है। अशोक वाजपेयी आलोचना को एक से बहुवचन में बदलते हैं।
हिन्दी में कुछ शानदार गद्य लिखने वालों में अशोक वाजपेयी का भी स्थान है। उनका सुसंस्कृत गद्य बीच-बीच में जड़े देशज नक्षत्रों की चमक से जगमगाता रहता है। उसमें कला-पुरुष की उदात्तता, गरिमा, विस्तार और आत्मविश्वास है। उनका व्यक्तित्व किसी वैश्विक लेखक-कार्यकर्ता का बनता है जो आजीवन इस महादेश के सांस्कृतिक साक्षरता में रत रहा ख़ासकर हिन्दी क्षेत्रा में।
अशोक वाजपेयी ने हिन्दी में लेखकों की पीढ़ी का मार्ग प्रशस्त किया और नेतृत्व भी। साहित्य और कला को देखने की उन्होंने समानान्तर दृष्टि प्रस्तावित की। उनका साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्रा में योगदान बड़ा और भव्य है। संस्थाओं के निर्माण और आयोजन के क्षेत्र में वह निर्विवाद रूप से हिन्दी क्षेत्र की बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध के केन्द्रीय व्यक्ति हैं और लेखन में महत्त्वपूर्ण भी।





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