मैं कह सकता हूँ कि वह न मनुष्य होने में चूके हैं और न लेखक होने में। अधिकांश रचनाएँ न केवल जीवन के मार्मिक हृदयस्पर्शी, भावोत्पादक चित्र पेश करती हैं, बल्कि अपना स्वतंत्र जीवन जीती हैं और पाठक को अपने में और लेखक के अंतरंग में समो लेती हैं। —अरविंद कुमार (शब्दकोशकार)




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