Gulmohar Se Din Rajnigandha Raaten

By: (Author)

450.00

  • Print length ‏ : ‎ 223 pages
  • ISBN-10 ‏ : ‎ 9382673903
  • ISBN-13 ‏ : ‎ 978-9382673903
  • Item Weight ‏ : ‎ 500 g
  • Country of Origin ‏ : ‎ India
  • Net Quantity ‏ : ‎ 1 Piece

डॉ. सुबोध दुबे जी के ललित निबंधों का अवलोकन करते हुए मेरा मन गंगा-स्नान से पवित्रा हो गया है। एक समय था जब ऐसे ही ‘गद्य-गीत’ लिखे जाते थे। रामकृष्णदास और रामवृक्ष बेनीपुरी के गद्य-गीतों को कोई भी सुधी पाठक कैसे भूल सकता है? उनकी रचनाओं में गीतों की असंख्य अंतःसलिलाएँ प्रवाहित होती महसूस होती थीं।

हमारा साहित्य जगत विद्यानिवास मिश्र, कुबेर नाथ राय, विवेकी राय और उमाकान्त मालवीय जैसे रचनाकारों की उज्ज्वल परंपरा से आज भी आलोकित है। श्याम सुंदर दुबे, डॉ. श्रीराम परिहार और डॉ. सत्येंद्र शर्मा के निबंध तो वेद की ऋचाओं के समान हैं, जो अपने समय और समाज से सीधा संवाद स्थापित करते हैं।

इन सभी संदर्भों और प्रसंगों से हमारी संवेदनाओं से तादात्म्य का एक सूत्र जुड़ जाता है। ये सब मिलकर एक तीर्थ की भाँति सदैव हमारी यादों के गलियारे में झिलमिलाते और जगमगाते रहते हैं। जब हम समग्र रूप से अग्रज सुबोध जी के निबंधों को भरत-भाव से पढ़ रहे हैं, तो यह अनुभूति और भी सघन हो उठती है।

सचमुच, अपने ललित निबंध संग्रह ‘गुलमोहर से दिन रजनीगंधा रातें’ में तो सुबोध भाई ने फाल्गुन और आषाढ़ की पाती ही बाँच दी है। शरद की चाँदनी में जहाँ कहीं वे भीगे हैं, वहाँ धर्मवीर भारती ठीक उनके बगल में आकर खड़े हो गए हैं। ये निबंध मुक्त छंद के गीत हैं, जिनमें भाषा का लालित्य रचनाकार की रूह की तरह साँस ले रहा है। शिकोहाबाद और मैनपुरी जैसे साधारण से दिखने वाले स्थान भी शब्दों की इस निजी दुनिया में असाधारण रूप से रेखांकित हुए हैं। सामान्य को असामान्य अनुभूति से सराबोर कर देना लेखनी का वह जादू है, जो सिर चढ़कर बोलता है। अब सीधे-सीधे समझ लीजिए कि इन निबंधों को पढ़ते हुए मैं इन शहरों के प्यार में पड़ गया हूँ। सुबोध भाई लिखते ही नहीं, दृश्य भी रचते हैं। उनके व्यक्ति-चित्रा और यात्रा-वृत्तांत में एक ऐसा चुंबक है, जो मन-प्राण के लोहे को आत्मीय ऊष्मा के धागों से खींचता है। और वह उक्ति चरितार्थ होने लगती है, जिसमें कहा गया है, ‘‘कच्चे धागे में बंधे आएँगे सरकार मेरे’’। वास्तव में, इन्हें पढ़ते हुए हम एक रेशमी आवर्त में ही घिर जाते हैं; चाँदनी का झरना-सा पिघलने लगता है।

यकीन कीजिए, मैं दिसंबर की एक जाती हुई शाम में बैठकर इन्हें पढ़ रहा हूँ और मेरे इर्द-गिर्द अलाव-सा जल उठा है; एक तल-स्पर्शी ताप का अनुभव कर रहा हूँ। बहुत दिनों बाद कुछ ऐसा पढ़ने को मिल रहा है कि मेरी आँखें ही पुण्यभागी हो गई हैं। ऐसा लगता है, मानो इन्हें मोरपंख से स्याही में डुबोकर लिखा गया है, या फिर इंद्रधनुष के रंगों की ही स्याही बना ली गई है और काग़ज़ पर शब्द ऐसे बिखेर दिए गए हैं कि काग़ज़ भी साँस लेने लगा है।

यश मालवीय

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