‘नाटक जारी है’ सचमुच ‘पेट और प्रजातंत्र के बीच’ ही नहीं, बल्कि लीलाधर शर्मा और लीलाधर जगूड़ी के बीच भी घटित हुआ। 1960 के बाद हिन्दी कविता में जो परिवर्तन आया उसे राजकमल चौधरी, धूमिल और लीलाधर जगूड़ी के बिना नहीं समझा जा सकता। ‘मुक्ति-प्रसंग’, ‘संसद से सड़क तक’ और ‘नाटक जारी है’, ये त्रिकोण बनता है छायावाद के बाद नई कविता में प्रविष्ट होने वाली तत्कालीन युवा कविता का। कविता संबंधी अकविता, भूखी कविता, शमशानी कविता आदि तमाम छिट-पुट काव्य आंदोलनों को ‘साठ के बाद की कविता’ में समाहित करते हुए इस संग्रह से एक नई काव्य धारा की परंपरा शुरू होती है जो अज्ञेय, मुक्तिबोध और रघुवीर सहाय आदि कवियों से कविता की भाषा और कथ्य के मिजाज को एकदम अलग कर देती है। लीलाधर जगूड़ी के इस संग्रह की कविताओं के कथ्य और भाषा की अनेक भंगिमाएँ उस समय भी और आज भी एकदम अलग और हटकर हैं। इनकी कविता अपने मन्तव्य का पुनराख्यान नहीं करती। वे लोक जीवन की आधुनिक प्रवृत्तियों को पकड़ते हैं और पुराने समय को नए युग में ढलते हुए देखते हैं। जगूड़ी नए समय और समाज में निर्मित होते नए व्यक्ति को लक्षित करते हैं। अपने हर नए संग्रह में वह व्यक्ति के सामाजिक द्वंद को अंकित करने के उद्यम से गुजरते हैं। कविजनोचित नाम रखने की रूढ़ि से बचते हुए लीलाधर जगूड़ी ने अपने मनुष्य होने के अटपटेपन के साथ जीवन के कोमल और खुरदुरेपन को अपने नाम और काम में तराशने के बावजूद मौजूद रखा है। यह संग्रह सबसे पहले विख्यात कथाकार राजेंद्र यादव ने अपने अक्षर प्रकाशन से 1970 में प्रकाशित करना चाहा था लेकिन उनके निजी कारणों से यह 1972 में प्रकाशित हुआ। राजेंद्र यादव पर कुछ लोग ‘कविताद्रोही’ होने का आरोप लगाते हैं लेकिन उन्हें ये कविताएँ कहानी, नाटक और कविता का समन्वय लगती थीं।





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