दो सौ से अधिक पृष्ठों के इस संग्रह में स्त्री जीवन के पाठ की अनसुनी-अदेखी कहानियाँ हैं जो पुरुष लेखकों की लिखी हैं। स्त्रीवादी विमर्श के लिए यह हिन्दी साहित्य में एक अनूठी कोशिश है जो स्त्री के अन्तर्द्वन्द्व, अंतःसंघर्ष और त्रासद अनुभवों को प्रत्यक्ष करती हैं। यक़ीनन भारतीय पाठकों की चेतना को वैश्विक धरातल पर ले जाने वाली ये कहानियाँ नये ढंग से उद्वेलित करने की क्षमता से लैस हैं। हर कहानी के कथ्य का अनूठापन पाठ का विषय है। हर कहानी पर बोलना पाठक के स्व-पाठ और भाव संसार में कंडीशनिंग कर सकता है और मैं इस अपराध से ख़ुद को बरज रहा हूँ और पाठकों को आमंत्रित कर रहा हूँ कि पाठ के उपरांत अपनी आज़ाद राय क़ायम करें। यादवेन्द्र को उनके इस ऐतिहासिक अनुवाद कर्म के लिए साधुवाद।
लीलाधर मंडलोई





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