आत्मकथात्मक आख्यान लेखक के जीवन में घटी वास्तविक घटनाओं का बेहद ईमानदारी से लिखा गया वृत्तांत होता है। आपबीती होते हुए भी वह उसमें नायक नहीं, केवल पात्र और कथा-वाचक होता है।
देवेंद्र मेवाड़ी के आत्मकथात्मक आख्यान इसी बात के गवाह हैं। ‘जीवन जैसे पहाड़’ उनकी लंबी आत्मकथात्मक दास्तान की तीसरी कड़ी है जो टेट्रालजी यानी चतुष्टयी के रूप में इस क्रम में लिखी जा रही हैµ‘मेरी यादों का पहाड़’, ‘छूटा पीछे पहाड़’, ‘जीवन जैसे पहाड़’ और… अब वे वर्तमान में अपने उसी अतीत की पुनर्यात्रा करके, उसे स्वयं अपनी आंखों से देख कर चतुर्थ भाग लिख रहे हैं, कि क्या हुआ साठ-सत्तर साल पुराने उनके उस अतीत का? वे कहते हैं—‘‘मैं सौभाग्यशाली हूँ कि अपने अतीत को आज स्वयं देख पा रहा हूँ।’’
देवेंद्र मेवाड़ी वरिष्ठ साहित्यकार और विज्ञान लेखक हैं। आत्मसंस्मरण, यात्रा वृत्तांत और लोकप्रिय विज्ञान की उनकी 30 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्होंने रेडियो और टेलीविजन के लिए भी खूब लिखा है। इन्हें विज्ञान की क़िस्सागोई का शौक है और अब तक एक लाख से अधिक बच्चों और बड़ों को विज्ञान की कहानियाँ सुना चुके हैं। श्री मेवाड़ी को साहित्य अकादमी का बाल पुरस्कार, वनमाली विज्ञान कथा सम्मान, विज्ञान भूषण, विज्ञान प्रौद्योगिकी सम्मान और भारतेन्दु हरिश्चंद्र बाल पुरस्कार जैसे अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है।




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