अहमद अल हलो कहाँ हो

By: (Author)

250.00

  • एडिशन ‏ : ‎ पहला संस्करण
  • भाषा ‏ : ‎ हिंदी
  • प्रिंट की लम्बाई ‏ : ‎ 208 पेज
  • ISBN-10 ‏ : ‎ 938161993X
  • ISBN-13 ‏ : ‎ 978-9381619933

डॉक्यूमेंट्री फिल्में बनाने के लिए जो विषय मैंने चुने वे विविध प्रकार के थे। हर फिल्म की निर्माण-प्रक्रिया के पीछे एक लंबा शोधकार्य था, शूटिंग करने के दौरान हर बार नया देश, नया परिवेश था, वहां की विशेष स्थितियां-परिस्थितियां थीं, हर बार नई चुनौतियाँ थीं और दूर-दराज़ की इन यात्राओं के दौरान मिले ऐसे अनेकों अनोखे चरित्र थे जो स्वयं में कई-कई कहानियां समेटे हुए थे। फिल्म में तो वही कहा जा सका जो उसका विषय था, बहुत कुछ ऐसा था जो अनकहा रह गया। फिल्म के फलक में जो समेटा जा सका वह अंजुरी भर था, बहुत कुछ ऐसा था जो चारों तरफ छलछला रहा था। कैमरे से जो छवियाँ बटोरी गईं वे झलकियाँ मात्र थीं, हजारों-हजार चलचित्र अभी भी उठते-बैठते इर्द-गिर्द परिक्रमा कर रहे थे। वे तमाम पात्र जिन्हें फिल्म के छोटे-से अंश में निबटा दिया गया था, जहन में अभी भी बसे थे और बार-बार तोहमत लगाते थे कि उन्हें अनसुना किया गया है। कहीं यह खलिश भी बराबर थी कि उन सब स्थितियों-परिस्थितियों की कैफियत या उनका बयान फिल्म की सीमा में नहीं समा पाया… और फिर सबसे बड़ा असंतोष यह कि वे तमाम अनुभव, अलग-अलग अवसरों पर उपजे वे भाव, नई से नई अनापेक्षित स्थितियों में उठते संवेग और वे अहसास सब कुछ अव्यक्त रह गया था। फिल्म खत्म कर लेने के साथ वह सब खत्म न हुआ था, न ही मद्धम पड़ा था बल्कि लगातार दिप-दिप कर रहा था। एक तरफ असंतोष की कचोट और दूसरी तरफ बराबर अधूरेपन का अहसास। इस सब के बावजूद यह पूर्वाभास भी था कि पिटारे का ढक्कन खोलना मुसीबत मोल लेना है और कि यह बखेड़ा खड़ा करने वाली बात होगी। लेकिन कहते हैं न कि दुश्वारी शौक बढ़ाती है।

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