गिनीपिग

By: (Author)

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  • एडिशन ‏ : ‎ पहला संस्करण
  • भाषा ‏ : ‎ हिंदी
  • प्रिंट की लम्बाई ‏ : ‎ 216 पेज
  • ISBN-10 ‏ : ‎ 8194740576
  • ISBN-13 ‏ : ‎ 978-8194740575
  • आइटम का वज़न ‏ : ‎ 350 g
  • कंट्री ऑफ़ ओरिजिन ‏ : ‎ इंडिया

इस संग्रह की अधिकांश कहानियाँ बहुआयामी और अपनी जटिल संरचना में अनेक ध्वनियाँ, छायाएँ और अर्थ समेटे अपना कथा-विन्यास गढ़ती हैं, लेखक अपनी निजी भाषा और देशज मुहावरों से समकालीन समाज की विसंगतियों को अनावृत्त करता है। इन कहानियों से बेतरतीबी से उठाए गए कुछ अंश दृष्टव्य हैं — ‘‘गर्म होती पृथ्वी की दोषी पश्चिम की धुआँ उगलती मशीनें हैं… तोहमत हम ग़रीबों पर कि तुम्हारे जलाये अलावों से धरती गुस्सा खा रही है’’ — ‘काला ताज’। ‘‘स्वर्णपति कौन? …कोई मौलिक सोच की बेवकूफी नहीं थी। नकल में बुद्धिमता का उम्मीद भरा किनारा था।’’ — ‘गधो! हर बोतल में समन्दर’। ‘‘एक सोनचिरैया घर में है… दूसरी लाकर कीकर का बाग लगाना है क्या? कीकर और आम का क्या मेल?’’ —‘सोनचिरैया का पहला गीत’। ‘‘उनकी आँखों में विचारों का अनुवाद था।’’ — ‘उपकथा’। ‘‘आज का युग ‘यंग एंड वाइल्ड’ जैसे जुमले के साँचे में ढला ‘मूवर्स ऐंड सेकर्स’ जैसी हसरतों से सजा और ‘फन एंड लव’ में रंगा लीलाधारी है। इसकी लीलाओं को श्रद्धा-भव से देखो।’’ — ‘माहिम पर प्रार्थना’। ‘‘दुनिया मानवीय अंगों को चूहे की पीठ बनता देख रही है और वह अपना बच्चा तक नहीं बचा पाई। साथ में यूट्रस खो बैठी।’’ — ‘उपनिवेश’। ‘‘किसी साफ्टवेयर की तरह समूची माँ मेरे अन्दर फीड है।’’ — ‘उपनिवेश’। ‘‘विज्ञापनों की रमक में जब कोई कार पर बैठे तो उसे लगे कि वह औरत पर चढ़ा है। सीट पर बेठे तो लगे औरत में धंसा है और तम्बाकू खाये तो लगे कि औरत को चबा रहा है।’’ — ‘बीसवीं सदी का जीवाश्म’। ‘‘ये पेड़ बन जाना इतना आसान है क्या? पेड़ बन जाना तन-मन की उच्चतम अवस्था है। पेड़ बनकर जलकुम्भी से पार पाया जा सकता है।’’ — ‘इंडिया मस्ट बी ब्लैड’।

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