आधी सदी का कोरस लगभग पचास वर्षों में लिखी गई कहानियाँ ही नहीं, इतने ही सालों के हमारे परिवेश के बदलाव की कुंजी भी हैं। इनके द्वारा हम वह दुनिया देख सकते हैं जिसे हमने पिछले पचास सालों में बरता है। कथाकार इनके द्वारा अपने को ठीक-ठीक पहचानने की कोशिश कर रहा है और उसी क्रिया में पाठक की मदद भी। धार्मिक अनुष्ठानों और सम्पन्नता के बरक्स प्रेम और विश्वास को खड़े रहने के लिए कितनी भी प्रबल आकांक्षा और आधार हो, ‘मकर संक्रांति’ में जीत उन ढकोसलों की ही होती है जिन्हें सम्पन्नता हमसे अपने छद्म को ढकने के लिए गढ़ती रहती है। विपन्नता हारती ही नहीं, शर्मिंदा भी होती है। पर रास्ता क्या है? कथानक यहाँ आकर इतना तीखा हो उठता है कि पाठक को सिर्फ अपने संवेदन पर ही भरोसा करना पड़ता है। अशोक अग्रवाल की ये उनचास कहानियाँ जीवन-मूल्यों में जो सुंदरतम है उसे बचाए रखने का प्रयास करती हैं और अपने छोटे-छोटे कदम उठाती हुई उस आंतरिक लय को उजागर करती हैं जो बहुत ही धीमे स्वर में बजती हुई संवेदन के उस अछूते स्तर पर उतरती है, जहाँ सिर्फ महसूस करना ही हाथ में रह जाता है— जो कुछ भी कहा या सुना जा रहा है उससे कहीं और बहुत दूर। यहाँ कहानी कला के मान्य प्रतिमानों और कथा-विकास की, आधुनिक चतुराई से लगभग परहेज़ करते हुए अशोक अग्रवाल मानव की मूल प्रकृति की पड़ताल करते हुए एक बड़े सर्जक की तरह आ खड़े होते हैं। यह वह जगह है जहाँ पाठक अपनी संवेदना में डूबता है और शास्त्राकार अपने शब्दों के अभाव में। ये कहानियाँ सरल व्याख्या की वस्तु हैं ही नहीं। — विनोद कुमार श्रीवास्तव

Aadhi Sadi Ka Koras
By: Vinod Kumar Shrivastav (Author)
₹950.00
- एडिशन : पहला संस्करण
- भाषा : हिंदी
- प्रिंट की लम्बाई : 560 पेज
- ISBN-10 : 9381619964
- ISBN-13 : 978-9381619964
- कंट्री ऑफ़ ओरिजिन : इंडिया



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