यात्रा का मतलब सिर्फ़ जगहों को बाहर से देखना ही तो नहीं होता। शहर के भीतर उतरना होता है और शहर को अपने भीतर उतारना होता है। अपने हठ छोड़ने होते हैं, सुविधाओं की पोटली कुछ दिन के लिये बंद करनी होती है। यात्रा में अपने आपको अमीर करना होता है। पहले से बनी अपनी पूर्व धारणा छोड़नी पड़ती है। अपने आपको समझाना होता है कि हमने जो कुछ बिना देखे मान रखा है, लोगों के बारे में, जगहों, संस्कृति, समाज, रीति-रिवाजों के बारे में जो राय बना रखी होती है उसे अनलर्न करना होता है और नए सिरे से सब कुछ अपनी आँखों से देखना होता है। अपने बने-बनाये फ्रे़म में नयी तस्वीर डालनी होती है।
मुझे इस यात्रा वृत्तांत को पढ़ते हुए भरपूर आनंद आया और स्मिता और उसकी सखी से रश्क भी होता रहा कि वे दोनों सब कुछ छोड़-छाड़ कर एक लंबी यात्रा पर निकल पड़ी हैं। अपने आपको हवाओं के भरोसे छोड़ दिया है। बेशक उनकी यात्रा के पड़ाव सीमित थे फिर भी उन्होंने इस बात की भरपूर गुंजाइश निकाली कि वे स्थानीय लोगों से मिलें, वहाँ के संगीत के बारे में, संस्कृति, लोक कला, प्रकृति प्रेम और इनसानी प्रेम के बारे में अपने आप को समृद्ध करें और अपने नए अनुभव को हम सबके साथ साझा करें। उन्हें जहाँ भी मौका मिला, ऑटो ड्राइवर से, टैक्सी वाले से, होटल वालों से, लोकल लोगों से, सहयात्रियों से बातचीत की और उनके बारे में रोचक जानकारी क़िस्सों की शक्ल में हमसे साझा की।
मैं उम्मीद करता हूँ कि उनकी ये यात्राएँ समय-समय पर जारी रहेंगी और हर बार वे नए क्षेत्र, नए इलाके़ एक्सप्लोर करेंगी। अगली यात्रा सोलो करेंगी और अपने अनुभव हमसे साझा करेंगी।
—सूरज प्रकाश







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