ये कविताएँ जब लिखी गयीं, तब मनोदशा दुख, विषाद और भय से व्याप्त थी— यह भौतिक जगत था और मेरा अपना फिजिकल अस्तित्व जिसे सहन करना दुष्कर हो गया था — मैं काले आवर्तों के अंदर थी — जगत मुझे एक सत्ता के रूप में प्रत्यक्ष दिखाई था — एक काले सागर के रूप में शायद यही शास्त्रों का भवसागर था — मैं इसके प्रति घोर वितृष्ण और ग्लानि से ग्रस्त थी, निस्तार का कोई उपाय मेरे पास नहीं था — यह समय के बीते हुए कल की दीर्घकालिकतामें अपने इसी रूप में जीवित था — इतिहास एक अनुवर्तित पन्ना था और कुछ नहीं — अमृता भारती

JIVAN KO MAINE PAHNA HI NAHIN
By: Amrita Bharti (Author)
₹495.00
- प्रकाशक : Kie Publication
- प्रकाशन की तारीख : 1 जनवरी 2017
- एडिशन : पहला संस्करण
- भाषा : हिंदी
- प्रिंट की लम्बाई : 256 पेज
- ISBN-10 : 9381623015
- ISBN-13 : 978-9381623015
- आइटम का वज़न : 300 g
- आकार : 22 x 19 x 4 cm
- सामान्य नाम : पुस्तक
More from Sambhavna Prakashan
Related products
-
Uncategorized
सोचो साथ क्या जाएगा (चौथा खंड) — दक्षिण पूर्व एशिया और ऑस्ट्रेलिया
₹300.00 Add to cart




Reviews
There are no reviews yet.