महिला हिन्दी कथाकारों में दीपक शर्मा की अपनी एक अलग और विशिष्ट पहचान है। कम शब्दों में एक विराट और बारीक फलक को समेटकर कहानी बुनने में उन्हें महारत हासिल है। उनकी हर कहानी एक बड़ा मयार रचकर पाठकों को अचंभित करने की क्षमता रखती हैं।
—सुधा अरोड़ा
हमारे यहाँ स्त्री विमर्श जिस भी पीड़ा और दंश में से निकला हो, उसे ऐसी सर्वव्यापी परिघटना में जिस तरह दीपक शर्मा ने अंकित किया है, उसका कोई जोड़ नहीं। उनकी कहानियाँ इतनी नुकीली हैं, इतनी मर्मभेदी, कि उनके असर से, उनकी अविस्मरणीयता से आप अछूते नहीं रह सकते। वह उन गिने-चुने हस्ताक्षरों में हैं जिनके बिना हिन्दी साहित्य का समकालीन स्त्री विमर्श असम्भव है।
—गगन गिल





Reviews
There are no reviews yet.