स्व. सुरेन्द्र मोहन के असंख्य मित्रों एवं घनिष्ठ सहयोगियों के लिए भी चुप रहना अय्यारी है एक सुखद विस्मय ले कर उपस्थित है। पहली बार प्रकाशित ये रचनाएँ पुनः याद दिलायेंगी कि वे उस दुर्लभ प्रजाति के राजनेता एवं विचारक थे जो एकाग्र मन-वचन-कर्म से न्याय, समता , लोकतंत्र,तथा धर्म-निरपेक्षता के हमारे दीर्घ राष्ट्रीय- गाँधीवादी-समाजवादी आदर्शों के लिए आजीवन निस्वार्थ संघर्ष करते रहे।





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