आत्मीयता के सघन राग से सृजित लेखक की जीवन यात्रा जिसके विभिन्न पड़ाव, शहर और अविस्मरणीय चरित्रा सहज ही पाठक को भी अपना सहयात्रा बना लेते हैं।—अशोक अग्रवाल
आपका लिखा ‘देखा’ हुआ-सा लगता है। शब्द नहीं, जैसे हज़ारों हज़ार आँखें हों एक-एक लर्ज़िश को दुलार से देखती।—नरेश गोस्वामी





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