बच्चों को प्रकृति से जो भी गुण मिले हैं, उन्हें मुखरित करना, उनके नैतिक गुणों को पहचानना और संवारना, उन्हें सच्चे, ईमानदार उच्च आदर्शों के प्रति निष्ठावान व्यक्ति, सच्चा मानव और नागरिक बनाना – इसे ही सुख़ोम्लीन्सकी अपना ध्येय समझते थे।
52 वर्ष की आयु में ही वसीली सुख़ोम्लीन्सकी का देहांत हो गया। वसीली सुख़ोम्लीन्सकी उन दिनों मास्को के पास दुश्न से लोहा ले रहे थे। लड़ाई में बुरी तरह घायल होने पर उन्हें सेना से लौटना पड़ा। उनकी छाती में मृत्युवाही धातु के टुकड़े धंस गए थे और हृदय में परिवार की त्रासदी का गहरा शोक बस गया था।
जर्मन फासिस्टों की पराजय के दिन से लेकर अपने जीवन के अंतिम दिन-2 सितंबर, 1970 – तक वसीली सुखोम्लीन्सकी बच्चों के लिए ही जिए। पाव्लिश गांव के बच्चों को यह नहीं पता था कि उन्हें जो व्यक्ति पढ़ाता है, जो उन्हें जंगलों-मैदानों में घुमाने ले जाता है, उसकी छाती में युद्ध ने कभी न भरने वाला घाव छोड़ा है।





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