एक बिल्कुल नए, कोरे, बनते हुए लेखक के एक वरिष्ठ लेखक परिवार; बल्कि उनके वृहत परिवार से धीरे-धीरे स्नेह-सम्पर्क में आने और एक सुदीर्घ सृजनात्मक साहचर्य से सींचे जाने, विकसित होने का यह संस्मरणात्मक आख्यान हिन्दी में अपनी तरह का अनूठा वृत्तांत है। बल्कि वृत्तांत भी नहीं क्योंकि पारस्परिक स्नेह और आदर के इस वृत्त का कोई अन्त नहीं। रमेशचंद्र शाह और ज्योत्स्ना मिलन से अपने साथ की इस कथा को अनिरुद्ध उमट कभी संस्मरणों और कभी पत्रों के माध्यम से कहते हैं। इसी कहने-सुनने में हमारे सामने एक पूरा जीवन-समय आकार लेने लगता है। एक ऐसा समय जिसमें एक लेखक का दूसरे से प्रतिकृत होना, उसकी संवेदना और काव्य-प्रवृत्ति के नाभिक को समझ कर उसे प्रोत्साहित करना, आवश्यकता होने पर टोकना, रचना के बारे में स्पष्ट और निर्मम राय देना और रचनात्मकता को सहेजना पोसना सब एक लय में होता रहता है।
यह क़िताब अपनी सहजता में संबंधों की विकास गाथा को तो कहती ही है; इसमें बहुत कुछ ऐसा जीवंत, स्पंदित और स्फूर्त है जो रमेशचंद्र शाह जैसे विलक्षण मनीषी साहित्यकार के ‘अनौपचारिक’ को भी अनायास उद्घाटित करता है। हम यहाँ साहित्य की बारीकियों, मर्मग्राही दृष्टि और कविता-कहानी के निस्संग विश्लेषण से ही नहीं मिलते, उनके सूक्ष्म विनोद बोध को भी एक सुखद अचरज से देख पाते हैं। वैसे ही ज्योत्स्ना मिलन भी अपनी वत्सलता, प्रखर और नवोन्मेषी सृजनात्मकता और सहज अपनेपन के साथ मिलती हैं।
यह एक प्यारी और ज़रूरी क़िताब है जिसमें हम रचनात्मक संग-साथ की एक ऐसी जीवंत और असमाप्त कहानी में प्रवेश कर जाते हैं जिससे बाहर निकलने का मन नहीं होता।
आशुतोष दुबे






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